Sunday, May 17, 2015

समाज में हिंदी की अलख जगा रहीं संजना तिवारी


चिलचिलाती धूप , लू के थेपेड़ों और धूलभरी आँधी से पूरी तरह बेपरवाह राजधानी के श्रीराम सेन्टर (एसआरसी) के सामने सड़क किनारे पटरी पर केवल हिंदी की किताबें बेचने वाली 42 वर्षीय संजना तिवारी अपने बुलंद हौंसलों से समाज में हिंदी की अलख जगा रहीं हैं।
         आज के दौर में जब अंग्रेजी भाषा एक ‘स्टाइल स्टेटमेंट’ बन गयी है, संजना हिंदी के प्रति लोगों विशेषकर युवाओं का नजरिया बदलना चाहती हैं। संजना ने कहा “बच्चे हिंदी से कटते जा रहे हैं। मैं हिंदी को लेकर उनकी हीन भावना दूर करना चाहती हूँ1 बहुत दुख होता है कि हिन्दुस्तान में रहकर हिंदी के लिए लड़ना पड़ता है।”

        उन्होंने कहा“ मैं साहित्य और कला का प्रचार करना चाहती हूँ। मैं किताबों से दूर नहीं हो सकती और उत्साह के साथ किताबें बेचती हूँ1 मैं मरते दम तक हिंदी का प्रचार करूंगी।” संजना की शादी 14 साल की उम्र में हुई थी लेकिन उन्होंने आगे पढ़ाई जारी रखने की शर्त पर शादी की थी। शादी के बाद संजना के पति राधेश्याम तिवारी ने उनका पूरा साथ दिया। हालांकि संजना का कहना है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उन्हें यह मिशन शुरू करने में देर हो गयी। हिंदी के लिए दोयम दर्जे वाली सोच बदलने और समाज में हिंदी की मशाल जलाने के उद्देश्य के साथ संजना ने यह बीड़ा उठाया।
         इससे पहले संजना श्रीराम सेंटर के अंदर किताबों का स्टॉल लगाती थी लेकिन कुछ कारणों से वहाँ स्टॉल बंद हो गया। संजना अभी इंदिरा गाँधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी(इग्नू) से बीए आनर्स हिंदी कर रही है। संजना ने कहा“ मैं आगे एम.ए और पीएचडी करना चाहती हूँ और हमेशा हिंदी का बढ़ावा देना चाहती हूँ1”
संजना के पास हजारों किताबें हैं और किसी पाठक की विशेष मांग पर वह अपनी स्कूटी से सिर्फ एक किताब खरीदने भी दरियागंज चल पड़ती हैं। संजना के पास कहानी, कविता, उपन्यास और आस-पास के माहौल के कारण ज्यादातर नाटकों की पुस्तकें हैं।
         संजना श्रीराम सेन्टर में जाकर नाटक भी देखती हैं। मोहन राकेश का आधे-अधूरे , लहरों का राजहंस और स्वेदश दीपक का कोर्ट मार्शल उनके पसंदीदा नाटक हैं। संजना जब नाटक देखने या किसी अन्य काम से कहीं जाती हैं तो उनका स्टॉल आस-पास के छात्र संभालते हैं। उन्होंने कहा “ छात्र और कलाकार बहुत मदद करते हैं, देखरेख करते हैं।” संजना का किताबों और हिंदी का ज्ञान आपको अचंभित कर देगा। ‘मैला आँचल”, ‘गालिब की माँ’ और ‘इश्क में शहर होना ’ उनकी पसंदीदा पुस्तकें हैं। संजना एक पाक्षिक पत्रिका ‘जिंदा लोग ’ का प्रकाशन भी करती है और उसकी संपादक भी है। ‘संजना प्रकाशन’ नाम से उनका खुद का पब्लिकेशन भी है।

      संजना बताती हैं कि दिल्ली सरकार की तरफ से पहले हंस, कथादेश, पहल, नया ज्ञानोदय और जिंदा लोग समेत 32 साहित्यिक पत्रिकाओं का विज्ञापन और अनुदान मिलता था लेकिन दिल्ली में नयी सरकार आने के बाद यह बंद हो गया, जिससे इन साहित्यिक पत्रिकाओं की आर्थिक स्थिति बदहाल है। खुद संजना को भी नहीं पता कि इस बार वह अपनी पत्रिका कैसे निकालेगी।
     संजना ने कहा “ इन पत्रिकाओं को विज्ञापन मिलने चाहिए। सरकार को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। पूरे देश में संदेश जाएगा कि दिल्ली सरकार साहित्य को लेकर काफी गंभीर है।”
बारिश की मार सिर्फ देश के किसानों पर ही नहीं पड़ी बल्कि संजना भी इससे त्रस्त है। खुले आसमान के नीचे पूरे जोश और जूनुन के साथ हिंदी का प्रचार कर रही संजना को बारिश का डर सताता रहता है। पिछले 15 दिसंबर को बारिश में उनकी काफी किताबें खराब हो गयी और उन्हें हजारों का नुकसान हुआ।
      संजना जो कर रही है उसका आर्थिक पक्ष उतना मजबूत नहीं है लेकिन इसके बावजूद इस पूरे इलाके में एनडीएमसी का एक भी किताबों का स्टॉल नहीं है। संजना ने किताबों को छत मुहैया कराने के लिए एनडीएमसी में अर्जी दे रखी हैं और इस संबंध में एनडीएमसी के पूर्व चेयरमैन जलज श्रीवास्तव से भी बात की थी लेकिन अभी तक मामला ठंडे बस्ते में है।