आत्मसम्मान के रास्ते
मंच पर सभी शबाना का इंतजार कर रहे थे और
तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूँज रहा था। शबाना ग्याहरवीं कक्षा की छात्रा
थी और दसवीं में पूरे विद्यालय में अव्वल आई थी। जिसके लिए उसे विद्यालय के
वार्षिक कार्यक्रम में पुरस्कार दिया जाना था। शबाना को गोद में उठाए जैसे उसके
पिताजी एक-एक सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे वैसे ही सभी शिक्षकों की आँखों में से अविरल
अश्रु की धारा बह रही थी। दरअसल शबाना शारीरिक तौर पर अपंग थी और चलने में असमर्थ
थी। शबाना के अब्बा रोज़ उसे गोद में उठाकर स्कूल
छोड़ने और लेने आते थे। शबाना की इस उपलब्धि पर न केवल उसके पिताजी को बल्कि पूरे
विद्यालय को गर्व था। यूँ तो शबाना पहले भी अपनी कक्षा में प्रथम आती थी लेकिन
बोर्ड परीक्षा में यह कमाल कर उसने सभी विद्यार्थियों के लिए मिसाल पेश की थी। उस
दिन विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम में इलाके के विधायक भी आए और उन्होंने शबाना
की सुविधा को देखते हुए विद्यालय को बाधा मुक्त(बैरियर फ्री) बनाने की घोषणा की
ताकि शबाना और उसके जैसे दूसरे छात्रों को आने-जाने में परेशानी न हो। हालांकि यह
देर से उठाया गया लेकिन उचित कदम था। विडंबना यह है कि इस सुविधा को पाने के लिए
शबाना को स्कूल में अव्वल आना पड़ा, नहीं तो न जाने कबतक स्कूल प्रशासन का ध्यान
इस पर न जाता।
हाल ही में जेएनयू विश्वविद्यालय ने भी
पूरे कैंपस को बाधा मुक्त बनाने की पहल की है ताकि अपंग विद्यार्थी भी
विश्वविद्यालय की सुविधाओं का पूरा लाभ उठा सकें। वे भी लाइब्रेरी में जाकर पढ़
सकें। सिर्फ अपंगता के कारण उन्हें लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने के अधिकार से वंचित
किया जाए यह तो उनके अधिकारों के साथ अन्याय है। जेएनयू प्रशासन की तरफ से उठाया
गया यह सराहनीय कदम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के बाकी विश्वविद्यालय भी ऐसा
कदम उठाऐंगे। संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के तहत स्वतंत्रता के अधिकार की
व्यवस्था की गई है। जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय राज्य क्षेत्र में
अबाध संचरण की स्वतंत्रता है। तो केवल अपंगता किसी की स्वतंत्रता में बाधक नहीं
होनी चाहिए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों के अलावा सार्वजनिक वाहनों को भी बाधा
मुक्त बनाना चाहिए। लो फ्लोर बस में गेट पर चढ़ने-उतरने के लिए अपंग व्यक्तियों
हेतु बाधा मुक्त सुविधा होनी चाहिए। ताकि बिना किसी सहारे के इंतजार में वह खुद
यात्रा करने में सक्षम हो सकें। नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए मेट्रो की तरह बसों
में स्टॉप आने की घोषणा की सुविधा होनी चाहिए। एक बार बस स्टॉप पर मैंने लडखडाते
हुए एक दृष्टिबाधित व्यक्ति को सहारा देने की कोशिश की तो उसने मेरी सहायता लेने से
इनकार कर दिया और विभिन्न परेशानियों को उठाते हुए खुद ही बस में चढ़ा। उस व्यक्ति
के आत्मसम्मान को देखकर मैं भी अपने आप को लज्जित महसूस कर रही थी। न जाने कब
बरसों से सोई पड़ी सरकार की नींद टूटेगी और वह इन लोगों के आत्मसम्मान को बरकरार
रखने के लिए कोई उचित कदम उठाएगी। विधवाओं के लिए घर, गरीब बच्चों के लिए स्कूल,
आस्था के नाम पर मंदिर-मस्जिद बनवाने पर लाखों का घोटाला करने वाले इन नेताओं को
अपंग लोगों के व्हीलचेयर, स्टिक आदि के मद में उपलब्ध राशि का घोटाला करते हुए भी जरा-सी शर्म नहीं आती।
अपंग लोगों के प्रति हमारे समाज का दृष्टिकोण भी सही नहीं है। उन्हें हीन भाव से
देखा जाता है। हाशिये पर पड़े इस वर्ग को जितनी जरुरत शिक्षा और अबाध संचरण की है।
उससे कई अधिक आवश्यकता सामाजिक प्रेम और सम्मान की है। राइट्स ऑफ पर्सन विद
डिसेब्लिटिज़ बिल के अंतर्गत ऐसी व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे ये वर्ग शोषण का
शिकार न हों और इनके प्रति दुर्भावना रखने वाले असंवेदनशील लोगों को भी सजा मिल
सकें। अगर इस समाज में सबको समान रुप से जीने का अधिकार मिल जायें तो न जाने शबाना
जैसे कितने लोगों की वजह से देश का सिर फ़र्क से ऊँचा हो जाएगा।