लोकतंत्र की गरिमा
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में संसद का
कार्यकाल पिछले दिनों काफी शर्मनाक रहा। लोकतंत्र के मंदिर पर ऐसा कुठाराघात हुआ
जिससे संसदीय गरिमा की धज्जियाँ ही उड़ गई। लोकसभा और राज्यसभा में जिस तरह
सांसदों ने अमर्यादित व्यवहार का परिचय दिया उससे लोकतंत्र के इस स्तंभ की नींव ही
हिल गई। जनता की अगुवाई करने वाले इन सांसदों की वजह से कई महत्वपूर्ण बिल संसद
में अटके ही रह गए। स्वतंत्र भारत में पहली बार 15वीं लोकसभा में सबसे कम केवल 163 बिल ही पास हो पाए। 15वीं लोकसभा का यह कार्यकाल प्रस्तावों पर चर्चा के बरक्स
हंगामे के लिए सुर्खियों में रहा। संसदीय कार्यशैली में हंगामे का बढ़ता चलन
लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करता है।
तेलंगाना बिल के विरोध में लोकसभा में
सांसदों ने जहां काली मिर्च का छिड़काव किया। वहीं राज्सभा में महासचिव शमशेर
के.शरीफ को धक्का देकर कागजात छिनने की कोशिश की गई। भारत के इतिहास में पहली बार
रेल मंत्री बजट भाषण पूरा नहीं पढ़ पाए। हंगामा मचाने में सांसदों के साथ विधायक
भी पीछे नहीं रही। जम्मू कश्मीर विधानसभा के एक विधायक ने मार्शल को ही थप्पड़
रसीद दिया, तो यूपी विधानसभा में दो विधायक कपड़े उतारकर विरोध करने लगे। दिल्ली
विधानसभा में तो एक विधायक नें सोमनाथ भारती को चूड़ी पहनाने का प्रयास किया। संविधान
के रक्षकों का यह व्यवहार पर लोकतंत्र के हृदय पर प्रहार है। जनता के लिए
नियम-कानूनों का निर्माण करने वाले इन सांसदों और विधायकों के लिए भी उचित कानून
होने चाहिए ताकि लोकतंत्र की साख पर प्रश्नचिन्ह न लगने पाए। सदन की कार्यवाही के
बीच हंगामा मचाना, प्रस्ताव को पेश न करने देना, कागजातों को फाड़कर हवा में
फहराना, स्पीकर का माइक तोड़ना जैसे काम तो इन शोहदों के लिए जरुरी हो गए। अगर ये
ऐसा न करें तो जनता को कैसे पता चलेगा कि कौन उनका सच्चा हमदर्द हैं और कौन उनकी
सदन में उनकी नुमाइंदगी कर रहा है? अगर संसदीय लोकतंत्र पर जनता के भरोसे को कायम
रखना है तो इन लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी। सिर्फ सदन की कार्यवाही से
निलंबित करना ही काफी नहीं है।
First elected loksabha 1952 bill passed (LS+RS) 333,
ReplyDelete1957 327
1962 272
1971 482
1977 130
1980 329
1984 334
1989 63
1991 227
1996 61
1998 56
1999 297
2004 248
2009 165
keep it up
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