Sunday, September 10, 2017

'Nikamma' Opposition

'Nikamma' Opposition
Dear opposition (specially congress)
Government gives you so many chances to gain political mileage over it but I think you are the most trashed and sluggish opposition in the history of India.
Let's start with demonetization. You had a golden opportunity to encash this issue but what you have done expect criticised government? Isn't your business to question government for stand up millions of people in queues. To question government that what we achieved through demonetization. There is so many questions by which you were  supposed to retain your political repo but you don't.
Is there any leader in congress or other opposition party who can claim himself or herself of the 'leader of farmers'. It is the hard luck of this so called civilised country that farmers were forced to eat their own excreta to draw attention to their plight. They have been protesting since long. Where is the opposition? Where is the so called 'Aadivasi & farmers' leader Rahul Gandhi? Did he returned from foreign tour's. I think Ghalib sahab said this line for you -
"Sharm inko magar nahin aati".
Today opposition is behaving like a loser. Over 60 children died in Gorakhpur due to encephalitis. The tragic death of neo-natal babies gives you new lease of life but did you grilled this issue? How could you enter in 2019 election with this ridiculous attitude. Did we choose you as opposition to sit quietly? I am sorry we don't. This is the biggest defeat of yours. If there was Bjp in place of you then they would definitely nailed it.
Actually there is a long list of such issues where you failed. From Gurmeet Singh to Gauri lankesh murder to recent Ryan case, you had or have so many issues to retrieve lost credentials. I am not disappointed with government but I disheartened with your attitude. Remember - A fog cannot be dispelled by a fan. 

Tuesday, September 6, 2016

सपना चौधरी.. तुम तो धोखेबाज निकली रे .!

सपना चौधरी (तस्वीर: सोशल मीडिया)
सपना चौधरी.. आप तो जानते ही होगे ना । वही, जो एक बार स्टेज पर आ जाती है तो कितने की दिलों की धड़कनें धक-धक करने लगती हैं। उसके एक-एक ठुमके पर यूपी, बिहार ही नहीं हरियाणा और यहां तक कि जम्मू कश्मीर भी ठुमकता है लेकिन उससे मेरी कुछ नाराजगी है। 

हरियाणा के रेवाड़ी जिले से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव है 'आसरा का माजरा'। मेरी बचपन की गर्मियों की सारी छुट्टियां इसी गाँव में बीती। ननिहाल है मेरा। मुझसे छोटी कितनी ही कजिन की शादियां हो चुकी है और बाइस की उम्र तक दो-दो बच्चों की माँ बन चुकी है। 

जहाँ किसी के चक्कर में आने के ड़र से अठारह की दहलीज पार करते ही लड़कियों को किसी की 'मर्दानगी' के आगे परोस दिया जाता और सानी भेने का ठेका दे दिया जाता है वहाँ भरे पंडाल में कूल्हे मटका के छोरी तेरे 'सालिड बाडी' वाले डांस पर में फिदा हो गई थी। 


सपना पहली बार तुम्हारे डांस की वीडियो देख कर कहा था 'बंदी की हिम्मत को सलाम' क्योंकि मैं अच्छी तरह जानती हूं कि मुंह खोलकर और आंखें फाड़ते हरियाणवियों के बीच ढुंगे मटकाना कोई मामूली बात तो नहीं। 

जहाँ मैं आज तक कट स्लीव्स पहनने की जुर्रत नहीं कर पायी वहाँ ऐसे सांग के लिए जिगर चाहिए। तुम समझती होगी कि एक कजिन की बारात में ले जाने के लिए हमने कैसे मानमुव्वल किया था और हमें ले जाकर एक कोठरी में बंद कर दिया और फरमान सुना दिया कि छोरियां भीत्तर ही रहेंगी। 

ऐसे में सपना तुम्हारा नाच इस समाज के मुंह पर करारा तमाचा था। जब नाच देखने वालों को शर्म नहीं तो करने वाली को क्यों हो? सपना तुम इतने कमजोर इरादों की तो नहीं हो सकती कि किसी के भद्देपन पर आत्महत्या की सोचो। पता नहीं तुमने यह कदम क्यों उठा लिया। 

क्यों मुझ जैसी अपनी हजारों फैन को मायूस कर दिया। तुमने तो लुघड़ी में से झांकती कितनी आंखों को रुआंसा कर दिया। अब जल्दी से ठीक हो जा छोरी और 'म्हीने भीत्तर सालिड बाडी' कर फिर कसूती नाच के दिखा।

Sunday, June 19, 2016

चेतन चौहान की नियुक्ति पर चिल्ल पौं करने वालों.. मत करो !

चेतन चौहान (तस्वीर: सोशल मीडिया)
कौन है जो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नॉलजी (NIFT) के चेयरमैन के रूप में पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान की नियुक्ति का मजाक उड़ा रहा है? भाईयों और बहनों बड़े नादान हैं आप। क्रिकेट और फैशन का बड़ा गहरा संबंध है। ठीक वैसा ही जैसा भंवरे का फूल से, तारों का आसमान से.....लेकर इमोजी का व्हाट्सएप से और मैसेंजर का फेसबुक से।

हां... तो बात यह है कि सरकारी हमारी बड़ी फाॅरवर्ड टाइप की है। वह कुछ अलग करने के लिए मचल रही है और पश्चिम के फैशन से भी आगे निकलना चाहती है। सरकार नहीं चाहती कि हमारे देश की लड़कियां सिर्फ क्राॅप टॉप, जम्प सूट, प्लाजो, वन पीस जैसे पिछड़े फैशन में ही बंधकर रह जाए इसलिए अब कुछ नया स्टाइल तैयार होगा और चेतन चौहान इस नए फैशन को ईजाद करने के लिए बिल्कुल परफेक्ट है।

क्या है कि अब ‘स्टॉकिंग’ (वो नेट वाली तरह-तरह की पजामियां, जो लड़के समझ नहीं पा रहे हैं वे राजीव चौक मेट्रो स्टेशन जाकर थोड़ा समय बिताएं) को थोड़ा नया लुक देना चाहते है तो उसमें अब क्रिकेटिंग पैड का फ्यूजन होगा। स्टॉकिंग को अब आगे से कवर करके पीछे से एक डोरी से बांधने की तैयारी है।

ओह माई गोड! मैं तो इमेजिन नहीं कर पा रही। गर्मी बहुत है और दुपट्टे या स्टॉल से मुंह ढंकने पर तर-तर पसीने आते है इसलिए अब क्रिकेट वाले हेलमेट का नया क्लेक्शन मार्केट में आएगा। होगा यह कि चेहरा आपका पूरा कवर होगा।

सपना चौधरी, तुमने तो कमाल ही कर दिया

सिर के पीछे सूती कपड़ा होगा और आगे जॉर्जट या फिर नेट का कपड़ा होगा, जिससे थोड़ी-थोड़ी हवा लगती रहेगी और मजनुओं की तीर-ए-निगाहों से भी बचाव होगा। सरकार फैशन के साथ लड़कियों की सुरक्षा की गारंटी भी देना चाहती है।

चेतन चौहान अब आपके इंटरनेशनल सेंस ऑफ ड्रेसिंग में भी तब्दीली करेंगे। अब आपको फोकट में एडवाइस दी जाएगी कि कौन-से देश जाने पर कौन-से रंग के कपड़े पहनने है। जैसे वेस्टइंडीज जाने पर मैजेंटा कलर, इंग्लैंड जाने पर गहरा नीला कलर, मसूद अजहर के देश जाने पर डार्क ग्रीन कलर वगैरह-वगैरह।

ऐसे ही नहीं सरकार के फैसले पर चिल्ल पौ मचानी चाहिए। पहले थोड़ा दिमाग पर जोर डालना चाहिए। मैं सरकार से एम्स में नवजोत सिंह सिद्धू, सेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट में बादल परिवार के किसी सदस्य, आईआईटी में हेमा मालिनी की नियुक्ति की पुरजोर मांग करती हूं।

Sunday, May 17, 2015

समाज में हिंदी की अलख जगा रहीं संजना तिवारी


चिलचिलाती धूप , लू के थेपेड़ों और धूलभरी आँधी से पूरी तरह बेपरवाह राजधानी के श्रीराम सेन्टर (एसआरसी) के सामने सड़क किनारे पटरी पर केवल हिंदी की किताबें बेचने वाली 42 वर्षीय संजना तिवारी अपने बुलंद हौंसलों से समाज में हिंदी की अलख जगा रहीं हैं।
         आज के दौर में जब अंग्रेजी भाषा एक ‘स्टाइल स्टेटमेंट’ बन गयी है, संजना हिंदी के प्रति लोगों विशेषकर युवाओं का नजरिया बदलना चाहती हैं। संजना ने कहा “बच्चे हिंदी से कटते जा रहे हैं। मैं हिंदी को लेकर उनकी हीन भावना दूर करना चाहती हूँ1 बहुत दुख होता है कि हिन्दुस्तान में रहकर हिंदी के लिए लड़ना पड़ता है।”

        उन्होंने कहा“ मैं साहित्य और कला का प्रचार करना चाहती हूँ। मैं किताबों से दूर नहीं हो सकती और उत्साह के साथ किताबें बेचती हूँ1 मैं मरते दम तक हिंदी का प्रचार करूंगी।” संजना की शादी 14 साल की उम्र में हुई थी लेकिन उन्होंने आगे पढ़ाई जारी रखने की शर्त पर शादी की थी। शादी के बाद संजना के पति राधेश्याम तिवारी ने उनका पूरा साथ दिया। हालांकि संजना का कहना है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उन्हें यह मिशन शुरू करने में देर हो गयी। हिंदी के लिए दोयम दर्जे वाली सोच बदलने और समाज में हिंदी की मशाल जलाने के उद्देश्य के साथ संजना ने यह बीड़ा उठाया।
         इससे पहले संजना श्रीराम सेंटर के अंदर किताबों का स्टॉल लगाती थी लेकिन कुछ कारणों से वहाँ स्टॉल बंद हो गया। संजना अभी इंदिरा गाँधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी(इग्नू) से बीए आनर्स हिंदी कर रही है। संजना ने कहा“ मैं आगे एम.ए और पीएचडी करना चाहती हूँ और हमेशा हिंदी का बढ़ावा देना चाहती हूँ1”
संजना के पास हजारों किताबें हैं और किसी पाठक की विशेष मांग पर वह अपनी स्कूटी से सिर्फ एक किताब खरीदने भी दरियागंज चल पड़ती हैं। संजना के पास कहानी, कविता, उपन्यास और आस-पास के माहौल के कारण ज्यादातर नाटकों की पुस्तकें हैं।
         संजना श्रीराम सेन्टर में जाकर नाटक भी देखती हैं। मोहन राकेश का आधे-अधूरे , लहरों का राजहंस और स्वेदश दीपक का कोर्ट मार्शल उनके पसंदीदा नाटक हैं। संजना जब नाटक देखने या किसी अन्य काम से कहीं जाती हैं तो उनका स्टॉल आस-पास के छात्र संभालते हैं। उन्होंने कहा “ छात्र और कलाकार बहुत मदद करते हैं, देखरेख करते हैं।” संजना का किताबों और हिंदी का ज्ञान आपको अचंभित कर देगा। ‘मैला आँचल”, ‘गालिब की माँ’ और ‘इश्क में शहर होना ’ उनकी पसंदीदा पुस्तकें हैं। संजना एक पाक्षिक पत्रिका ‘जिंदा लोग ’ का प्रकाशन भी करती है और उसकी संपादक भी है। ‘संजना प्रकाशन’ नाम से उनका खुद का पब्लिकेशन भी है।

      संजना बताती हैं कि दिल्ली सरकार की तरफ से पहले हंस, कथादेश, पहल, नया ज्ञानोदय और जिंदा लोग समेत 32 साहित्यिक पत्रिकाओं का विज्ञापन और अनुदान मिलता था लेकिन दिल्ली में नयी सरकार आने के बाद यह बंद हो गया, जिससे इन साहित्यिक पत्रिकाओं की आर्थिक स्थिति बदहाल है। खुद संजना को भी नहीं पता कि इस बार वह अपनी पत्रिका कैसे निकालेगी।
     संजना ने कहा “ इन पत्रिकाओं को विज्ञापन मिलने चाहिए। सरकार को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। पूरे देश में संदेश जाएगा कि दिल्ली सरकार साहित्य को लेकर काफी गंभीर है।”
बारिश की मार सिर्फ देश के किसानों पर ही नहीं पड़ी बल्कि संजना भी इससे त्रस्त है। खुले आसमान के नीचे पूरे जोश और जूनुन के साथ हिंदी का प्रचार कर रही संजना को बारिश का डर सताता रहता है। पिछले 15 दिसंबर को बारिश में उनकी काफी किताबें खराब हो गयी और उन्हें हजारों का नुकसान हुआ।
      संजना जो कर रही है उसका आर्थिक पक्ष उतना मजबूत नहीं है लेकिन इसके बावजूद इस पूरे इलाके में एनडीएमसी का एक भी किताबों का स्टॉल नहीं है। संजना ने किताबों को छत मुहैया कराने के लिए एनडीएमसी में अर्जी दे रखी हैं और इस संबंध में एनडीएमसी के पूर्व चेयरमैन जलज श्रीवास्तव से भी बात की थी लेकिन अभी तक मामला ठंडे बस्ते में है।

Saturday, March 8, 2014

लोकतंत्र की गरिमा
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में संसद का कार्यकाल पिछले दिनों काफी शर्मनाक रहा। लोकतंत्र के मंदिर पर ऐसा कुठाराघात हुआ जिससे संसदीय गरिमा की धज्जियाँ ही उड़ गई। लोकसभा और राज्यसभा में जिस तरह सांसदों ने अमर्यादित व्यवहार का परिचय दिया उससे लोकतंत्र के इस स्तंभ की नींव ही हिल गई। जनता की अगुवाई करने वाले इन सांसदों की वजह से कई महत्वपूर्ण बिल संसद में अटके ही रह गए। स्वतंत्र भारत में पहली बार 15वीं लोकसभा में सबसे कम केवल 163 बिल ही पास हो पाए। 15वीं लोकसभा का यह कार्यकाल प्रस्तावों पर चर्चा के बरक्स हंगामे के लिए सुर्खियों में रहा। संसदीय कार्यशैली में हंगामे का बढ़ता चलन लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करता है।
तेलंगाना बिल के विरोध में लोकसभा में सांसदों ने जहां काली मिर्च का छिड़काव किया। वहीं राज्सभा में महासचिव शमशेर के.शरीफ को धक्का देकर कागजात छिनने की कोशिश की गई। भारत के इतिहास में पहली बार रेल मंत्री बजट भाषण पूरा नहीं पढ़ पाए। हंगामा मचाने में सांसदों के साथ विधायक भी पीछे नहीं रही। जम्मू कश्मीर विधानसभा के एक विधायक ने मार्शल को ही थप्पड़ रसीद दिया, तो यूपी विधानसभा में दो विधायक कपड़े उतारकर विरोध करने लगे। दिल्ली विधानसभा में तो एक विधायक नें सोमनाथ भारती को चूड़ी पहनाने का प्रयास किया। संविधान के रक्षकों का यह व्यवहार पर लोकतंत्र के हृदय पर प्रहार है। जनता के लिए नियम-कानूनों का निर्माण करने वाले इन सांसदों और विधायकों के लिए भी उचित कानून होने चाहिए ताकि लोकतंत्र की साख पर प्रश्नचिन्ह न लगने पाए। सदन की कार्यवाही के बीच हंगामा मचाना, प्रस्ताव को पेश न करने देना, कागजातों को फाड़कर हवा में फहराना, स्पीकर का माइक तोड़ना जैसे काम तो इन शोहदों के लिए जरुरी हो गए। अगर ये ऐसा न करें तो जनता को कैसे पता चलेगा कि कौन उनका सच्चा हमदर्द हैं और कौन उनकी सदन में उनकी नुमाइंदगी कर रहा है? अगर संसदीय लोकतंत्र पर जनता के भरोसे को कायम रखना है तो इन लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी। सिर्फ सदन की कार्यवाही से निलंबित करना ही काफी नहीं है।

Sunday, February 16, 2014

आत्मसम्मान के रास्ते 
मंच पर सभी शबाना का इंतजार कर रहे थे और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूँज रहा था। शबाना ग्याहरवीं कक्षा की छात्रा थी और दसवीं में पूरे विद्यालय में अव्वल आई थी। जिसके लिए उसे विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम में पुरस्कार दिया जाना था। शबाना को गोद में उठाए जैसे उसके पिताजी एक-एक सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे वैसे ही सभी शिक्षकों की आँखों में से अविरल अश्रु की धारा बह रही थी। दरअसल शबाना शारीरिक तौर पर अपंग थी और चलने में असमर्थ थी। शबाना के अब्बा रोज़ उसे गोद में उठाकर स्कूल छोड़ने और लेने आते थे। शबाना की इस उपलब्धि पर न केवल उसके पिताजी को बल्कि पूरे विद्यालय को गर्व था। यूँ तो शबाना पहले भी अपनी कक्षा में प्रथम आती थी लेकिन बोर्ड परीक्षा में यह कमाल कर उसने सभी विद्यार्थियों के लिए मिसाल पेश की थी। उस दिन विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम में इलाके के विधायक भी आए और उन्होंने शबाना की सुविधा को देखते हुए विद्यालय को बाधा मुक्त(बैरियर फ्री) बनाने की घोषणा की ताकि शबाना और उसके जैसे दूसरे छात्रों को आने-जाने में परेशानी न हो। हालांकि यह देर से उठाया गया लेकिन उचित कदम था। विडंबना यह है कि इस सुविधा को पाने के लिए शबाना को स्कूल में अव्वल आना पड़ा, नहीं तो न जाने कबतक स्कूल प्रशासन का ध्यान इस पर न जाता।
हाल ही में जेएनयू विश्वविद्यालय ने भी पूरे कैंपस को बाधा मुक्त बनाने की पहल की है ताकि अपंग विद्यार्थी भी विश्वविद्यालय की सुविधाओं का पूरा लाभ उठा सकें। वे भी लाइब्रेरी में जाकर पढ़ सकें। सिर्फ अपंगता के कारण उन्हें लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने के अधिकार से वंचित किया जाए यह तो उनके अधिकारों के साथ अन्याय है। जेएनयू प्रशासन की तरफ से उठाया गया यह सराहनीय कदम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के बाकी विश्वविद्यालय भी ऐसा कदम उठाऐंगे। संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के तहत स्वतंत्रता के अधिकार की व्यवस्था की गई है। जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय राज्य क्षेत्र में अबाध संचरण की स्वतंत्रता है। तो केवल अपंगता किसी की स्वतंत्रता में बाधक नहीं होनी चाहिए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों के अलावा सार्वजनिक वाहनों को भी बाधा मुक्त बनाना चाहिए। लो फ्लोर बस में गेट पर चढ़ने-उतरने के लिए अपंग व्यक्तियों हेतु बाधा मुक्त सुविधा होनी चाहिए। ताकि बिना किसी सहारे के इंतजार में वह खुद यात्रा करने में सक्षम हो सकें। नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए मेट्रो की तरह बसों में स्टॉप आने की घोषणा की सुविधा होनी चाहिए। एक बार बस स्टॉप पर मैंने लडखडाते हुए एक दृष्टिबाधित व्यक्ति को सहारा देने की कोशिश की तो उसने मेरी सहायता लेने से इनकार कर दिया और विभिन्न परेशानियों को उठाते हुए खुद ही बस में चढ़ा। उस व्यक्ति के आत्मसम्मान को देखकर मैं भी अपने आप को लज्जित महसूस कर रही थी। न जाने कब बरसों से सोई पड़ी सरकार की नींद टूटेगी और वह इन लोगों के आत्मसम्मान को बरकरार रखने के लिए कोई उचित कदम उठाएगी। विधवाओं के लिए घर, गरीब बच्चों के लिए स्कूल, आस्था के नाम पर मंदिर-मस्जिद बनवाने पर लाखों का घोटाला करने वाले इन नेताओं को अपंग लोगों के व्हीलचेयर, स्टिक आदि के मद में उपलब्ध राशि का घोटाला करते हुए भी जरा-सी शर्म नहीं आती। अपंग लोगों के प्रति हमारे समाज का दृष्टिकोण भी सही नहीं है। उन्हें हीन भाव से देखा जाता है। हाशिये पर पड़े इस वर्ग को जितनी जरुरत शिक्षा और अबाध संचरण की है। उससे कई अधिक आवश्यकता सामाजिक प्रेम और सम्मान की है। राइट्स ऑफ पर्सन विद डिसेब्लिटिज़ बिल के अंतर्गत ऐसी व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे ये वर्ग शोषण का शिकार न हों और इनके प्रति दुर्भावना रखने वाले असंवेदनशील लोगों को भी सजा मिल सकें। अगर इस समाज में सबको समान रुप से जीने का अधिकार मिल जायें तो न जाने शबाना जैसे कितने लोगों की वजह से देश का सिर फ़र्क से ऊँचा हो जाएगा। 

Sunday, February 2, 2014

धरने पे धरना
अन्ना का बोलबाला, भ्रष्टाचारियों का मुंह काला...............................
लोकपाल लाओ, भ्रष्टाचार भगाओ.....................................जैसे नारों की गूंज से एक धरना पार्टी का आगाज़ हुआ। कभी शीला दीक्षित के घर के सामने धरना दिया तो कभी पुलिस थानों के सामने। भई! कुछ भी कहो धरना देने में तो आप का कोई जवाब ही नहीं है। धरने पे धरना करके ऐसा चमत्कार किया कि बाकी पार्टियों को जमीन पर ला धरा। लोगों के दुख-दर्द दूर करने वाले धरना महाराज ने तो मुख्यमंत्री पद की शपथ भी धरना स्थल पर ही ली।
देखो, खुद धरना करो तो ठीक है लेकिन अब मुख्यमंत्री जी सोचते है ये अच्छी मुसीबत मोल ली।  धरने की परंपरा तो गले की फांस ही बन गई। आज डीटीसी कर्मचारी धरने पर है कल सब्जीमंडी वाले धरने पर जाऐंगे और सुना तो कुछ ऐसा है कि मुख्यमंत्री जी की लाडली ऑटो सेना परसों धरने पर जाएगी। भई! सच बात तो ये है कि भारत का नाम न तो सचिन तेंडुलकर ने ऊँचा किया और न ही अमिताभ बच्चन ने। नाम तो देश का धरने वालों ने रोशन किया। सूत्रों से उड़ती-उड़ती खबर मिली है कि जंतर-मंतर और रामलीला जैसे धरना स्थलों पर कोचिंग सेंटर खुलने जा रहे है।
‘‘शांति से बैठने में फेल तो सीधा धरना पास डिग्री ले जाइये’’- धरना कोचिंग वाले
 (नोट- धरना स्थल का सारा कॉपीराइट सिर्फ हमारे पास है और हमारी कहीं और कोई शाखा नहीं है।)
मुझे तो ड़र इस बात का है कि कहीं चिंटू की मम्मी द्वारा पिंटू के पापा को आँख मारने पर सोसाइटी की सारी मम्मियाँ धरने पर न बैठ जाए और मांग करें कि आँख मारने पर गाइडलाइंस बनाई जाए।