Saturday, March 8, 2014

लोकतंत्र की गरिमा
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में संसद का कार्यकाल पिछले दिनों काफी शर्मनाक रहा। लोकतंत्र के मंदिर पर ऐसा कुठाराघात हुआ जिससे संसदीय गरिमा की धज्जियाँ ही उड़ गई। लोकसभा और राज्यसभा में जिस तरह सांसदों ने अमर्यादित व्यवहार का परिचय दिया उससे लोकतंत्र के इस स्तंभ की नींव ही हिल गई। जनता की अगुवाई करने वाले इन सांसदों की वजह से कई महत्वपूर्ण बिल संसद में अटके ही रह गए। स्वतंत्र भारत में पहली बार 15वीं लोकसभा में सबसे कम केवल 163 बिल ही पास हो पाए। 15वीं लोकसभा का यह कार्यकाल प्रस्तावों पर चर्चा के बरक्स हंगामे के लिए सुर्खियों में रहा। संसदीय कार्यशैली में हंगामे का बढ़ता चलन लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करता है।
तेलंगाना बिल के विरोध में लोकसभा में सांसदों ने जहां काली मिर्च का छिड़काव किया। वहीं राज्सभा में महासचिव शमशेर के.शरीफ को धक्का देकर कागजात छिनने की कोशिश की गई। भारत के इतिहास में पहली बार रेल मंत्री बजट भाषण पूरा नहीं पढ़ पाए। हंगामा मचाने में सांसदों के साथ विधायक भी पीछे नहीं रही। जम्मू कश्मीर विधानसभा के एक विधायक ने मार्शल को ही थप्पड़ रसीद दिया, तो यूपी विधानसभा में दो विधायक कपड़े उतारकर विरोध करने लगे। दिल्ली विधानसभा में तो एक विधायक नें सोमनाथ भारती को चूड़ी पहनाने का प्रयास किया। संविधान के रक्षकों का यह व्यवहार पर लोकतंत्र के हृदय पर प्रहार है। जनता के लिए नियम-कानूनों का निर्माण करने वाले इन सांसदों और विधायकों के लिए भी उचित कानून होने चाहिए ताकि लोकतंत्र की साख पर प्रश्नचिन्ह न लगने पाए। सदन की कार्यवाही के बीच हंगामा मचाना, प्रस्ताव को पेश न करने देना, कागजातों को फाड़कर हवा में फहराना, स्पीकर का माइक तोड़ना जैसे काम तो इन शोहदों के लिए जरुरी हो गए। अगर ये ऐसा न करें तो जनता को कैसे पता चलेगा कि कौन उनका सच्चा हमदर्द हैं और कौन उनकी सदन में उनकी नुमाइंदगी कर रहा है? अगर संसदीय लोकतंत्र पर जनता के भरोसे को कायम रखना है तो इन लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी। सिर्फ सदन की कार्यवाही से निलंबित करना ही काफी नहीं है।

Sunday, February 16, 2014

आत्मसम्मान के रास्ते 
मंच पर सभी शबाना का इंतजार कर रहे थे और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूँज रहा था। शबाना ग्याहरवीं कक्षा की छात्रा थी और दसवीं में पूरे विद्यालय में अव्वल आई थी। जिसके लिए उसे विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम में पुरस्कार दिया जाना था। शबाना को गोद में उठाए जैसे उसके पिताजी एक-एक सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे वैसे ही सभी शिक्षकों की आँखों में से अविरल अश्रु की धारा बह रही थी। दरअसल शबाना शारीरिक तौर पर अपंग थी और चलने में असमर्थ थी। शबाना के अब्बा रोज़ उसे गोद में उठाकर स्कूल छोड़ने और लेने आते थे। शबाना की इस उपलब्धि पर न केवल उसके पिताजी को बल्कि पूरे विद्यालय को गर्व था। यूँ तो शबाना पहले भी अपनी कक्षा में प्रथम आती थी लेकिन बोर्ड परीक्षा में यह कमाल कर उसने सभी विद्यार्थियों के लिए मिसाल पेश की थी। उस दिन विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम में इलाके के विधायक भी आए और उन्होंने शबाना की सुविधा को देखते हुए विद्यालय को बाधा मुक्त(बैरियर फ्री) बनाने की घोषणा की ताकि शबाना और उसके जैसे दूसरे छात्रों को आने-जाने में परेशानी न हो। हालांकि यह देर से उठाया गया लेकिन उचित कदम था। विडंबना यह है कि इस सुविधा को पाने के लिए शबाना को स्कूल में अव्वल आना पड़ा, नहीं तो न जाने कबतक स्कूल प्रशासन का ध्यान इस पर न जाता।
हाल ही में जेएनयू विश्वविद्यालय ने भी पूरे कैंपस को बाधा मुक्त बनाने की पहल की है ताकि अपंग विद्यार्थी भी विश्वविद्यालय की सुविधाओं का पूरा लाभ उठा सकें। वे भी लाइब्रेरी में जाकर पढ़ सकें। सिर्फ अपंगता के कारण उन्हें लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने के अधिकार से वंचित किया जाए यह तो उनके अधिकारों के साथ अन्याय है। जेएनयू प्रशासन की तरफ से उठाया गया यह सराहनीय कदम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के बाकी विश्वविद्यालय भी ऐसा कदम उठाऐंगे। संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के तहत स्वतंत्रता के अधिकार की व्यवस्था की गई है। जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय राज्य क्षेत्र में अबाध संचरण की स्वतंत्रता है। तो केवल अपंगता किसी की स्वतंत्रता में बाधक नहीं होनी चाहिए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों के अलावा सार्वजनिक वाहनों को भी बाधा मुक्त बनाना चाहिए। लो फ्लोर बस में गेट पर चढ़ने-उतरने के लिए अपंग व्यक्तियों हेतु बाधा मुक्त सुविधा होनी चाहिए। ताकि बिना किसी सहारे के इंतजार में वह खुद यात्रा करने में सक्षम हो सकें। नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए मेट्रो की तरह बसों में स्टॉप आने की घोषणा की सुविधा होनी चाहिए। एक बार बस स्टॉप पर मैंने लडखडाते हुए एक दृष्टिबाधित व्यक्ति को सहारा देने की कोशिश की तो उसने मेरी सहायता लेने से इनकार कर दिया और विभिन्न परेशानियों को उठाते हुए खुद ही बस में चढ़ा। उस व्यक्ति के आत्मसम्मान को देखकर मैं भी अपने आप को लज्जित महसूस कर रही थी। न जाने कब बरसों से सोई पड़ी सरकार की नींद टूटेगी और वह इन लोगों के आत्मसम्मान को बरकरार रखने के लिए कोई उचित कदम उठाएगी। विधवाओं के लिए घर, गरीब बच्चों के लिए स्कूल, आस्था के नाम पर मंदिर-मस्जिद बनवाने पर लाखों का घोटाला करने वाले इन नेताओं को अपंग लोगों के व्हीलचेयर, स्टिक आदि के मद में उपलब्ध राशि का घोटाला करते हुए भी जरा-सी शर्म नहीं आती। अपंग लोगों के प्रति हमारे समाज का दृष्टिकोण भी सही नहीं है। उन्हें हीन भाव से देखा जाता है। हाशिये पर पड़े इस वर्ग को जितनी जरुरत शिक्षा और अबाध संचरण की है। उससे कई अधिक आवश्यकता सामाजिक प्रेम और सम्मान की है। राइट्स ऑफ पर्सन विद डिसेब्लिटिज़ बिल के अंतर्गत ऐसी व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे ये वर्ग शोषण का शिकार न हों और इनके प्रति दुर्भावना रखने वाले असंवेदनशील लोगों को भी सजा मिल सकें। अगर इस समाज में सबको समान रुप से जीने का अधिकार मिल जायें तो न जाने शबाना जैसे कितने लोगों की वजह से देश का सिर फ़र्क से ऊँचा हो जाएगा। 

Sunday, February 2, 2014

धरने पे धरना
अन्ना का बोलबाला, भ्रष्टाचारियों का मुंह काला...............................
लोकपाल लाओ, भ्रष्टाचार भगाओ.....................................जैसे नारों की गूंज से एक धरना पार्टी का आगाज़ हुआ। कभी शीला दीक्षित के घर के सामने धरना दिया तो कभी पुलिस थानों के सामने। भई! कुछ भी कहो धरना देने में तो आप का कोई जवाब ही नहीं है। धरने पे धरना करके ऐसा चमत्कार किया कि बाकी पार्टियों को जमीन पर ला धरा। लोगों के दुख-दर्द दूर करने वाले धरना महाराज ने तो मुख्यमंत्री पद की शपथ भी धरना स्थल पर ही ली।
देखो, खुद धरना करो तो ठीक है लेकिन अब मुख्यमंत्री जी सोचते है ये अच्छी मुसीबत मोल ली।  धरने की परंपरा तो गले की फांस ही बन गई। आज डीटीसी कर्मचारी धरने पर है कल सब्जीमंडी वाले धरने पर जाऐंगे और सुना तो कुछ ऐसा है कि मुख्यमंत्री जी की लाडली ऑटो सेना परसों धरने पर जाएगी। भई! सच बात तो ये है कि भारत का नाम न तो सचिन तेंडुलकर ने ऊँचा किया और न ही अमिताभ बच्चन ने। नाम तो देश का धरने वालों ने रोशन किया। सूत्रों से उड़ती-उड़ती खबर मिली है कि जंतर-मंतर और रामलीला जैसे धरना स्थलों पर कोचिंग सेंटर खुलने जा रहे है।
‘‘शांति से बैठने में फेल तो सीधा धरना पास डिग्री ले जाइये’’- धरना कोचिंग वाले
 (नोट- धरना स्थल का सारा कॉपीराइट सिर्फ हमारे पास है और हमारी कहीं और कोई शाखा नहीं है।)
मुझे तो ड़र इस बात का है कि कहीं चिंटू की मम्मी द्वारा पिंटू के पापा को आँख मारने पर सोसाइटी की सारी मम्मियाँ धरने पर न बैठ जाए और मांग करें कि आँख मारने पर गाइडलाइंस बनाई जाए।

Thursday, January 16, 2014

व्यक्ति बनाम मुद्दे की बहस

राजनीतिक दल माने या न माने पाँच राज्यों में विधानसभा के चुनाव लोकसभा के लिए सेमीफाइनल माने जा सकते है। आम आदमी पार्टी की तरफ से अरविंद केजरीवाल को लोकसभा चुनाव का प्रमुख चेहरा बनाए जाना एक उचित कदम है। केजरीवाल एक ऐसे नेता है जिसकी तरफ महंगाई से त्रस्त जनता सुशासन के लिए टकटकी लगाए देख रही है। आप ने राजनीति की परिभाषा ही बदलकर रख दी और पुराने ढ़र्रे पर चल रही कांग्रेस-बीजेपी को अपनी नीतियों की तरफ सोचने पर मजबूर कर दिया। जाति, धर्म, और क्षेत्र की राजनीति से ऊपर उठकर आप ने मुद्दे और विचारधारा की राजनीति को नेपथ्य से निकालकर नीतियों के सर्वप्रमुख बिंदु के रुप में सामने रखा।
पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को इतनी बुरी शिकस्त मिली कि उसने एक बूंद पानी तक नहीं मांगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी बगावत पर उतर आए है और पार्टी को आमूल-चूल बदलाव की नसीहत तक दे रहे है। राहुल गांधी स्वयं आप से सीख लेने की बात कह रहे है। लेकिन इन चुनावों में बीजेपी के उत्तम प्रदर्शन का कारण भी यह नहीं था कि वह एक अच्छी पार्टी साबित होगी या उसने अपने काम से जनता का दिल जीत लिया हो। बीजेपी की जीत का कारण किसी अन्य राजनीतिक पार्टी का विकल्प न होना रहा। 'आप' ने लोगों को एक विकल्प दिया है कि वह पुराने ढर्रे पर चली आ रही पार्टियों को अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव के लिए विवश कर सकें। आप में वो बात है कि वह राजनीति में कांग्रेस-बीजेपी के एकछत्र राज को समाप्त कर सकें। केवल भ्रष्टाचार, महंगाई जैसे मुद्दों की वजह से ही कांग्रेस नहीं हारी बल्कि आम जनता की अनदेखी और उन्हें सिर्फ वोट पाने का हथियार समझने के कारण पराजित हुई। राजनीति की जमीन पर वोट की फसल पैदा करने के एकमात्र उद्देश्य वाली इस पार्टी को मतदाताओं ने इलहाम करा दिया कि वो उसके हाथ का चाबुक नहीं बनेंगें। 2013-14 को दौर 1947 की तरह है जब ब्रिटिश राज के खात्मे के लिए जनता स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़ी। आज फिर वहीं स्थिति है जब विभिन्न जनांदोलन से जनता का आक्रोश सामने आ रहा है। कांग्रेस-बीजेपी की साम्प्रदायिक और कुशासन की राजनीति से तंग आ चुकी जनता उसकी नींव उखाड़कर फेंकने के लिए आतुर है।
आप ने लोकसभा चुनाव को मोदी बनाम राहुल की बहस से बाहर निकालकर व्यक्ति बनाम मुद्दे की बहस की शक्ल दी है। बिजली-पानी जैसे मुद्दों पर अपने वादे पूरे करके केजरीवाल ने उम्मीद की लौ जलाई है। राजनीतिक प्रतिबद्धता को प्रकट करती आम आदमी पार्टी को जरुरत है इसी तरह जनहित में काम करने की। आप ने खास न बनने का जो नया राजनीतिक चलन शुरु किया है उसे उसपर बने रहना होगा तभी आगे की ड़गर आसान होगी।


Monday, January 13, 2014

आगामी लोकसभा चुनावों में नई इबारत लिखेगा न्यू मीडिया
फेसबुक और टिवटर पर पनपे समाज को लुभाने की कोशिश में लगे है सभी राजनीतिक दल
भारत में चुनावी माहौल गरमाते ही विभिन्न राजनीतिक दल जनता को लुभाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। ढ़ोल-नगाड़ों के साथ हवा में हाथ लहराते हुए हज़ारों लुभावने वादों के साथ नेता, उनके कार्यकर्ता विकास कार्यों के दावों से पटे पड़े पर्चें बांटते हुए चलते हैं। बाद में इन्हीं पर्चों का जहाज बना बच्चें आसमान में उड़ा देते है। बेफिज़ूली के खर्चों पर टिकी हुयी इस पारंपरिक चुनावी प्रणाली को आज न्यू मीडिया कड़ी टक्कर दे रहा है। न्यू मीडिया (फेसबुक, गूगल+, ब्लॉक, टिवटर, यू-ट्यूब, वॉट्सएप) के द्वारा आज बड़े-बड़े नेता अपना और अपनी पार्टी का जमकर प्रचार कर रहे हैं। बाजार में सस्ते स्मार्टफोन के कारण मोबाइल पर भी न्यू मीडिया का विस्फोटक पदार्पण हो चुका है। हालात यह है कि न्यू मीडिया के सहारे वोट बैंक की राजनीति की जा रही है।
2014 में लोकसभा चुनावों के मद्देनजर कोई भी प्रतिभागी न्यू मीडिया की ताकत को नज़रअंदाज करने का जोख़िम नहीं उठा सकता। न्यू मीडिया का उपभोग करने वालों में सबसे बड़ी जमात युवाओं की है। जो इन युवाओं को लुभाने में कामयाब हुआ है, वो आज राजनीति के उच्च शिखर पर विराजमान है। बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने युवाओं की नब्ज़ पकड़ ली है जिसकी बदौलत मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान राजनीति में पैठ कर रही न्यू मीडिया के प्रभाव को देखते हुए कांग्रेस ने भी आगामी चुनावों के लिए दिल्ली कार्यालय में व्यापक स्तर पर मीडिया एवं आईटी विभाग स्थापित किया है। न्यू मीडिया के प्रभाव से अन्य राजनैतिक दल भी अछूते नहीं है। आम आदमी पार्टी लोगों को एसएमएस भेजकर समर्थन जुटाने में लगी हुई है, वहीं कुछ दिनों पहले टिवटर पर राजनेताओं की बयानबाजी का मज़ाक उड़ाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री ने भी हाल ही में फेसबुक पर एंट्री मारी है। अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को तो न्यू मीडिया ने ही हवा दी, जिससे पूरा देश मी अण्णा हजारे आहे की टोपी लगाए फिरने लगा। निर्भया बलात्कार कांड से पैदा जनाक्रोश ने तो सरकार की नींद ही उड़ाकर रख दी। ये दोनों ही आंदोलन पूरी तरह से न्यू मीडिया के सहयोग से उपजे, जिसने सरकार विरोधी मुहिम की जमीन तैयार की। इन घटनाओं से यह संकेत निकाला जा सकता है कि अब न्यू मीडिया ही राजनीतिक क्रांति और परिवर्तन का सूत्रधार बनेगा। न्यू मीडिया के सहारे हम निश्चित रूप से ऐसी अवधि की तरफ बढ़ रहे हैं जो संसदीय व्यवस्था और पार्टी पॉलिटिक्स को सुदृढ़ करने की अवधि है।
पारंपरिक राजनीति से बेहतर है न्यू मीडिया प्रभावी राजनीति:
राजनीति का असल मतलब केवल वोटों से लगाया जाता है। लोकतंत्र में चुनाव को महज गिनती का खेल समझने वाली सभी राजनीतिक पार्टियाँ इस प्रवृत्ति की शिकार है। चुनावी परिणाम को धन और बल के सहारे अपने पक्ष में करने की प्रक्रिया पारंपरिक राजनीति का ही एक हिस्सा बन चुकी है। वस्तुतः बंदूक के बल पर ही छोटा-सा समूह अपनी परंपरागत सत्ता टिकाए रखना चाहता है। बंदूक के जोर पर ही वह चुनाव जीत जाना चाहता है। न्यू मीडिया के आने से समाज में नई चेतना एवं जागृति आई है। आज नेताओं को वोट पाने के लिए फेसबुक और टिवटर पर सक्रिय होना पड़ रहा है। एक अंग्रेजी दैनिक समाचार-पत्र में प्रकाशित रिर्पोट के अनुसार दिल्ली में ही कांग्रेस के 43 में से 30 एमएलए फेसबुक और टिवटर पर सक्रिय है। वे अपने फेसबुक पेज पर अपने कार्यक्रमों, फोटो और होर्डिंग्स को अपलोड करके अपना वोट बैंक बढ़ा रहे है। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर विभिन्न राजनैतिक दल वर्कशॉप आयोजित करवाकर अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को न्यू मीडिया पर जनता से संवाद करने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। बिना बंदूक की नोंक पर वोट पाने की यह राजनीति परंपरागत राजनीति से कई गुना बेहतर है।
आज फेसबुक, टिवटर और व्हॉट्सएप जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर यह पता लगाना कठिन है कि कौन कायस्थ है तथा कौन ब्राह्मण। राजनीति की जमीन पर जात की फसल को रोकने में यह आधुनिक व्यवस्था परंपरागत राजनीति की दीवारों को तोड़ती है। पारंपरिक राजनीति में ही नहीं बल्कि आज भी कई जगह स्थानीय निकायों में आमतौर पर ऊँची जातियों ने सत्ता पर इजारेदारी कायम कर ली है। साम्प्रदायिकता के हथकंडे का इस्तेमाल और मुसलमानों के खिलाफ धार्मिक उन्माद पैदा करने से रोकने में न्यू मीडिया एक क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है। न्यू मीडिया पर जन्मा यह समाज सड़ी-गली राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने का माद्दा रखता है। चुनावी मौसम नजदीक आते ही नेताओं द्वारा पैमफ्लेट, पर्चें और झण्डे बंटने शुरु हो जाते हैं, लेकिन अब न्यू मीडिया के आने से इन खर्चों पर लगाम लगाई जा सकती है। साथ ही चुनाव आयोग की निष्पक्ष मतदान की प्रक्रिया को भी गति मिल सकती है।


न्यू मीडिया के सहारे वोट बैंक बढ़ाने की कवायदः
पिछले साल गुजरात विधानसभा चुनाव में तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने नरेन्द्र मोदी ने थ्री-डी प्रचार तकनीक से युवाओं को लुभाने का प्रयास किया। देश में एकसाथ 53 जगहों पर सभाएं आयोजित करवाकर सम्बोधित करने का यह अपने आप में एक अनूठा तरीका था। मोदी ने न्यू मीडिया की ताकत को बखूबी पहचाना, नतीजतन आज वह बीजेपी की तरफ से 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार है। देश में इंटरनेट के बढ़ते प्रसार ने सभी राजनीतिक दलों को न्यू मीडिया पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए बाध्य किया है। टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया के आकंडों के अनुसार मार्च 2013 तक मोबाइल के मार्फत इंटरनेट चलाने वालों की संख्या 164.81 मिलियन है। जिसमें से अकेले 84 प्रतिशत युवा इंटरनेट के द्वारा सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं। आज देश के युवा राजनीति में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। थोड़ी-सी देर में ही कोई भी राजनैतिक घटना टिवटर पर ट्रेंडिंग टॉपिक और समाचार चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है। आडवाणी अपने ब्लॉक में कुछ भी लिखते है तो वह चर्चा का विषय बन जाता है। बाद में इन्हीं विषयों पर विशेषज्ञ बुलाकर बड़ी-बड़ी बहस आयोजित कराई जाती है। अतः न्यू मीडिया ही आज बातचीत का एजेंडा तय कर रहा है। नेताओं द्वारा यू-ट्यूब पर वीडियो अपलोड की जा रही है। भाजपा अपने प्रमुख नेताओं के रिकार्डेड वीडियो और ऑडियो भाषणों का भी मोबाइल के जरिए जनता तक पहुँचा रही है। आईआरआईएस नॉलेज फाउंडेशन द्वारा की गई रिसर्च के अनुसार सोशल मीडिया आगामी चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने तथा नई सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। न्यू मीडिया की इसी क्षमता के कारण प्रत्येक पार्टी सोशल मीडिया पर जमकर प्रचार कर रही है। आम आदमी पार्टी अपनी उपलब्धियों के प्रचार के लिए हैशटैग का खूब इस्तेमाल कर रही है। आप के फेसबुक पर इतने कम समय में लगभग 3.33 लाख और टिवटर पर 1.35 लाख प्रशंसक हो गए हैं। न्यू मीडिया की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अब तो फेसबुक और टिवटर पर नेताओं के बीच व्यक्तिगत छींटाकशीं का दौर ही चल पड़ा है। टिवटर पर मोदी और राहुल के समर्थकों के बीच क्रमशः फेंकू और पप्पू का ट्रेंड चल पड़ा है।
आईआरआईएस और आईएएमएआई (इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन इन इंडिया) की रिपोर्ट बताती है कि न्यू मीडिया के कारण उच्च प्रभावित निर्वाचन क्षेत्र वे हैं, जहाँ फेसबुक उपभोक्ताओं की संख्या पिछले लोकसभा चुनाव में जीतने वाले प्रतिभागी के वोटों के अंतर से ज्यादा है और जहाँ फेसबुक इस्तेमालकर्ताओं की संख्या कुल मतदाता जनसंख्या की 10 प्रतिशत है। इस रिर्पोट के आधार पर कहा जा सकता है कि न्यू मीडिया 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणामों को प्रभावित कर सकता है। अपनी ताकत का लोहा तो यह ईरान के चुनावों में, ओबामा के दूसरी बार अमेरिका का राष्ट्रपति चुने जाने पर तथा इजिप्ट में राजनैतिक उथलपुथल के रूप में मनवा चुका है। आगामी लोकसभा चुनाव राजनीतिक परिवर्तन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण होने जा रहे है। आईआरआईएस और आईएएमएआई की रिर्पोट के अनुसार 543 निर्वाचन क्षेत्रों में से सोशल मीडिया द्वारा सबसे ज्यादा प्रभावित 160 निर्वाचन क्षेत्र हैं। यह आकंडें चुनावों में नए समीकरण बना सकते हैं।
न्यू मीडिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके कारण जनता को अपने नेता तक पहुँचने के लिए पूर्व अनुमति की जरुरत नहीं पड़ती, केवल एक बटन पर क्लिक करते ही उनतक अपनी बात रखी जा सकती है। वर्तमान समय में लाखों लोग फेसबुक, टिवटर, व्हॉट्सएप जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स का जमकर इस्तेमाल कर रहे है। ये स्थिति नेताओं के लिए एक बहुत बड़ा मौका है व्यापक स्तर पर अपने मतदाताओं तक पहुँचने का और जनाधार का निर्माण करने का। वो भी बहुत कम कीमत पर।

दैनिक भास्कर के 11 दिसम्बर के अंक में और आजतक में http://aajtak.intoday.in/story/new-media-will-give-a-new-dimention-to-upcoming-loksabha-election-1-750128.html प्रकाशित।